पंडित जी ने भूत को बंदी बनाया
पितृपक्ष का समय था। एक ब्राह्मण अपने बहू (पत्नी) को विदा कराने अपने ससुराल जा रहे थे। रास्ते में उसे एक व्यक्ति मिलता है और वह पंडित जी से पूछता है , पंडित जी कहां जा रहे हैं ? पंडित जी उस व्यक्ति को बताते हैं कि वह अपनी बहू को विदा कराने ससुराल जा रहे है। इस पर वह व्यक्ति बोलता है अभी तो पितृपक्ष का महीना चल रहा है और इस महीने में कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता। वह ब्राह्मण वेवाक होकर बोला , यह सब नियम ब्राह्मणों पर लागू नहीं होता है। वह आदमी कर भी क्या सकता था चुप रहा। पंडित जी अपने ससुराल पंहुचते है। पंडित जी की खातिरदारी उनके ससुराल में खूब होती है। विदाई के लिए लड़की के घर वाले मना करते हैं कि अभी पित्र पक्ष चल रहा है , ऐसे में कन्या की विदाई नहीं हो सकती। किंतु पंडित जी अपने हठ पर रहे। विदाई आज ही होगी , ससुराल वालों ने कन्या की विदाई कर दी। पंडित जी कन्या को लेकर अपने घर को निकल जाते हैं। चलते – चलते उस ब्राह्मण को प्यास लगी। वह एक कुएं के पास रुका और लौटा – डोरी से पानी निकालने लगा। एक व्यक्ति पुनः ब्राह्मण के पास आता है और पानी पिलाने के लिए आग्रह करता है।...