पंडित जी ने भूत को बंदी बनाया
पितृपक्ष का समय था। एक ब्राह्मण अपने बहू (पत्नी) को विदा कराने अपने ससुराल जा रहे थे। रास्ते में उसे एक व्यक्ति मिलता है और वह पंडित जी से पूछता है , पंडित जी कहां जा रहे हैं ? पंडित जी उस व्यक्ति को बताते हैं कि वह अपनी बहू को विदा कराने ससुराल जा रहे है। इस पर वह व्यक्ति बोलता है अभी तो पितृपक्ष का महीना चल रहा है और इस महीने में कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता।
वह ब्राह्मण वेवाक होकर बोला , यह सब नियम ब्राह्मणों पर लागू नहीं होता है।
वह आदमी कर भी क्या सकता था चुप रहा।
पंडित जी अपने ससुराल पंहुचते है।
पंडित जी की खातिरदारी उनके ससुराल में खूब होती है।
विदाई के लिए लड़की के घर वाले मना करते हैं कि अभी पित्र पक्ष चल रहा है , ऐसे में कन्या की विदाई नहीं हो सकती।
किंतु पंडित जी अपने हठ पर रहे।
विदाई आज ही होगी , ससुराल वालों ने कन्या की विदाई कर दी।
पंडित जी कन्या को लेकर अपने घर को निकल जाते हैं।
चलते – चलते उस ब्राह्मण को प्यास लगी। वह एक कुएं के पास रुका और लौटा – डोरी से पानी निकालने लगा।
एक व्यक्ति पुनः ब्राह्मण के पास आता है और पानी पिलाने के लिए आग्रह करता है।
पंडित जी जैसे ही लौटा कुएं में डालते हैं , वह व्यक्ति पंडित जी को उठाकर कुए के अंदर डाल देता है।
वह व्यक्ति पंडित जी का भेष बनाकर कन्या को लेकर पंडित जी के घर निकल पड़ता है।
घर पर कन्या का स्वागत हुआ , दोनों खुशी-खुशी रहने लगे।
लगभग दो महीने बीत गए होंगे , पंडित जी कुए में ही फंसे हुए थे।
एक दिन कुंए के रास्ते एक व्यापारी गुजर रहा था , उसके बैलों के गले में टंगी हुई घंटी बज रही थी।
घंटी की आवाज सुनकर कुएं से पंडित जी ने आवाज लगाई कि –
” मेरी सहायता की जाए ”
व्यापारी घबरा गया , यह आवाज कुएं में से आ रही है , कोई भूत आवाज तो नहीं दे रहा है ?
इसके बाद क्या हुआ ?
डरते – डरते व्यापारी कुएं के पास गया , उसने बताया कि वह पंडित है किसी ने धोखे से मुझे कुएं में डाल दिया है। व्यापारी की सहायता से पंडित जी बाहर निकलते हैं और वह अपने गांव के लिए रवाना होते हैं। पंडित जी अपने घर पहुंचते हैं तो वहां अपने ही भेष में एक व्यक्ति को पाते हैं , जो उनके पिताजी के साथ कार्य कर रहा था। सभी गांव के लोग उस बहरूपिये को ही पंडित जी समझने लगे थे। इस पर पंडित जी ने अपना परिचय बताया कि मैं आपका बेटा हूं। मगर पंडित जी के पिताजी कैसे मानते दो महीने से वह बहरूपिया उनके बेटे के रूप में उनके साथ रह रहा था और सभी लोग पंडित जी ही समझ रहे थे। अब क्या था दोनों पंडित जी में झगड़ा होना शुरू हुआ कि मैं असली हूं तुम नकली , दूसरा कहे मैं असली हूं तुम नकली।
इसका झगड़ा बढ़ता गया और राजा के समक्ष न्याय के लिए पहुंच गए।
राजा ने कहा ठीक है मैं न्याय करूंगा इसके लिए एक ऊंचा चबूतरा बनाया जाए और राज्य के सभी लोगों को आमंत्रण किया जाए। ऐसा ही हुआ चबूतरा ऊंचा तैयार किया गया और सभी राज्य निवासियों को इस न्याय को देखने के लिए बुलाया गया। राजा अपने तय समय के अनुसार वहां पहुंच गए , उन्होंने एक लोटा भी मंगाया था।
राजा ने दोनों पंडित जी को वहां पुनः पूछा कि असली कौन है ? और नकली कौन ?
किंतु दोनों अपने आपको असली साबित करते रहे
इस पर राजा ने बोला कि जो भी सबसे पहले इस लोटे में घुसकर बाहर निकलेगा मैं , उसको न्याय दूंगा। इस पर एक पंडित जी झट से उस लोटे में घुस गए। बस क्या था राजा ने लोटे का मुंह ऊपर से बंद कर दिया , अब वह अंदर से चिल्लाने लगे कि राजा मुझे क्षमा कर दो , अब मैं ऐसी गलती फिर नहीं करूंगा। बस क्या था लोगों को पता चल गया था , असली पंडित जी कौन है। क्योंकि मानव रूप में कोई भी व्यक्ति लोटे के अंदर प्रवेश कैसे कर सकता था ? वह भूत था जो पंडित जी के पितृपक्ष में किए गए कार्य का दंड देने के लिए उनके जीवन में शामिल हुआ था। इसलिए कोई भी शुभ कार्य पित्र पक्ष में नहीं करना चाहिए , ऐसा बुजुर्गों का मानना है।
कुछ समय की बात होती है , इसमें नियम का पालन करने से कोई नुकसान नहीं होता।
विधि – विधान आदि का ध्यान रखकर ही किसी भी कार्य को करना शुभ माना जाता है।
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